16, अगस्त, डीडी न्यूजपेपर।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई देशभक्तों ने अपनी जान दी। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, करतार सिंह सराभा जैसे देशभक्तों के नाम सभी की जुबान पर हैं ।लेकिन कई देशभक्त ऐसे भी है जिनके नाम प्रत्येक व्यक्ति नहीं जानता. ऐसे ही एक क्रांतिकारी देशभक्त का नाम है मदनलाल ढींगरा, मात्र 26 वर्ष की आयु में देश के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान कर दिया. इनका जन्म खत्री पंजाबी परिवार में 18 सितंबर 1883 को अमृतसर (भारत)में हुआ।आपके पिता सिविल सर्जन थे और अंग्रेजी स्टाइल में रहना पसंद करते थे। जबकि उनकी माता जी. धार्मिक प्रवृत्ति की. उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था। परंतु मदनलाल प्रारंभ से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे। इसी कारण उन्हें लाहौर के विद्यालय से निकाल दिया गया था। परिवार ने भी उनसे नाता तोड़ लिया था। तब उन्होंने एक लिपिक, एक तांगा चालक और एक मजदूर के रूप में काम करके अपना पेट पाला। जब वे एक कारखाने में मजदूर थे तब उन्होंने एक यूनियन बनाने का प्रयास किया, परंतु वहां से उन्हें निकाल दिया गया। मदन लाल ढींगरा देश बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों के थे प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर के एम बी इंटरमीडिएट कॉलेज से प्राप्त की. फिर वह उच्च शिक्षा के लिए गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी लाहौर पढ़ने चले गए। फिर वे मुम्बई में काम करने लगे और बाद में अपने बड़े भाई की सलाह और मदद के चलते सन् 1906 में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैड चले गए। जहां ‘यूनिवर्सिटी कॉलेज’ लंदन में यांत्रिक प्रौद्योगिकी में प्रवेश लिया। यही से उनके जीवन ने एक नया मोड़ लिया। लंदन में वे विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे राष्ट्रवादियों के संपर्क में आए।
उस दौरान खुदीराम बोस, कनानी दत्त, सतिंदर पाल और कांशीराम जैसे देशभक्तों को फांसी दिए जाने की घटनाओं से लंदन में पढ़ने वाले छात्र तिलमिलाए हुए थे और उनके मन में बदला की भावना थी।
फिर एक बार 1 जुलाई 1909 को ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ का लंदन में वार्षिक दिवस समारोह आयोजित हुआ जहां पर कई अंग्रेजों के साथ कई भारतीयों ने भी शिरकत की। यहीं पर अंग्रेज़ों के लिए भारतीयों से जासूसी कराने वाले ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम कर्ज़न वाइली भी पधारे थे। ढींगरा भी इस समारोह में अंग्रेजों को सबक सिखाने के उद्देश्य से गए थे। हाल में जैसे ही कर्ज़न वाइली ने प्रवेश किया तभी ढींगरा ने रिवाल्वर से उस पर 4 गोलियां दाग दीं। कर्ज़न को बचाने का प्रयास करने वाला पारसी डॉक्टर कोवासी ललकाका भी ढींगरा की गोलियों से मारा गया।
कर्जन को गोली मारने के बाद ढींगरा खुद को भी गोली मारने ही वाले थे कि तभी उन्हें पकड़ लिया गया। इसके बाद लंदन में बेली कोर्ट में 23 जुलाई को ढींगरा के केस की सुनवाई करके के बाद जज ने उन्हें मृत्युदण्ड देने का आदेश दिया। 17 अगस्त सन् 1909 को उन्हें फांसी दे दी गयी। उनकी देश भक्ति के सम्मान में भारत सरकार ने 1992 में उनके नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया था। इस महान देश भगत को भावभीनी श्रद्धांजलि।
दर्शन सिंह तनेजा
लेक्चरर फिजिक्स
सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल खुईखेड़ा







